इंसान की छलांग पर मौसम मेहरबान

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तकनीक के आने से इंसान मतलबी होने लगा और हम की भावना से मैं पर आ गया । इसका नतीजा यह हुआ कि संगठित परिवार बिखरने लगे और एक दो सदस्यों के बने परिवारों ने कुदरत का दोहन बिना किसी सीमा से करना शुरू किया । इससे सीधे तौर पर वह दुनिया के वातावरण को खराब करने वालों में जुड़ गया ।

आज नतीजा यह है कि जंगल मे आग लगी है, (लगाई नही गई ) खेती की जमीन प्लास्टिक से भर रही है , ज्यादा पैसा कमाने के लिए ज्यादा कीटनाशक और रसायन इस्तेमाल करने पड़ रहे है ।

केंसर, मधुमेह, और अन्य तरह की बीमारियों के मरीजों से आये दिन अस्पताल भरे पड़े है ।

फिर मौसम की मार कुदरत का कहर है !

बेमौसमी बरसात, ज्यादा बर्फ, सूखा, तेज हवा, ज्यादा गर्मी, नए नई बीमारियां, बढ़ता तापमान ! जिम्मेवार कौन, सुनेगा कौन, और सुधरेगा कौन ।

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